गोरौल वैशाली जाहिद वारसी की रिपोर्ट।
पुरे देश में मुस्लिम भाइयों ने सोमवार को रमजान का चांद देखकर मंगलवार से रखा रोजा।
11 मार्च सोमवार की संध्या में रमजान का चांद देखकर तरावी का नमाज पढा गया गया साथ ही मंगलवार से एक महीना चलने वाला पाक (पवित्र ) रमजान का पहला रोजा शुरू।
भुखे रहने का नाम रोजा नही है,
रमजान का महीना पाक महीना माना गया है, रमजान का महीना इबादत का महीना कहा जाता है, इस महीने में इबादत करने वालों का अल्लाह सभी दुआएं कबूल करता है, लेकिन उसकी इबादत कैसे करना है ये सबसे अहम बात है, हम दिन भर भुखे प्यासे रोजा रखे और दुकानदारी करते वक्त झूठ बोल कर ग्राहक से पैसा लें, हराम का कमाई करें, झूठ बोलें, एक दूसरे का बुराई करें, ग़लत काम करने वाले का साथ दें, अपने पड़ोसी को सताएं चाहे वो किसी जाति धर्म का हो, हम भर अच्छे अच्छे इफ्तार करें और गरीब लाचार पानी से रोजा खोले तो वो रोजा किसी काम का नही है, ये सब पैगम्बर मुहम्मद साहब ने पहले ही बता दिया है कि रमजान का महीना पाक महीना है बुराईयों को बुराइयों को खत्म करने का महीना है, अपने गुनाहों से पाक होकर ज़िन्दगी की नई शुरुआत करना है, और साथ ही पुरी ज़िन्दगी इस पर अमल करना तभी जाकर अल्लाह दुआ कबूल करता है, पैगम्बर मुहम्मद साहब ने कहा कि मुसलमान पड़ोसी चाहे वो किसी भी जाति धर्म का हो उसका सभी तरह से ख्याल रखना है , कहीं वो भुखा तो नही है, रमजान का महीना उर्दू कैलेंडर के अनुसार साल का 9 वां महीना है और अल्लाह कहता है ये मेरा महीना है, इसी महीने में पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्लाह व आले ही वसल्लम पर कुरान नाजिल हुआ, रमजान का रोजा सभी बालिग औरत मर्द पर फर्ज है, वहीं कुछ लोगों को समय के अनुसार छुट दिया गया है, जैसे बीमार व्यक्ति, यात्रा पर चलने वाले व्यक्ति, हामला ( गर्भवती ) महिलाएं, मासिक धर्म से पीड़ित महिला, अधिक बुढ़े, बच्चे को छुट दि गई है, रमजान के महीने में सभी बुराइयों से तौबा कर के पुरे एक माह रोजा रखना कुरान पढ़ना नमाज पढ़ना साथ तरावी पढ़ना, जकात खैरात देना , वहीं ईद की नमाज से पहले फिरते का पैसा देना फर्ज है, फिरते का पैसा प्रति व्यक्ति चाहे वो बुढा हो या एक दिन का बच्चा सभी का देना है प्रती व्यक्ति ढाई किलो गेहूं का दाम बाजार के दाम से देना होगा गरीब, मजबूर, लाचार व्यक्ति को तभी जाकर ईद की नमाज होगी, वहीं जो खुद अत्यंत गरीब, मजबूर, लाचार है उनको जरूरी नहीं है, कहा गया है कि ईद की नमाज पढ़ने एक रास्ते से जाना चाहिए और दुसरे रास्ते वापिस आना चाहिए,







