गोरौल (वैशाली)। माहे रमजान के दूसरे जुमे के मुबारक मौके पर, जामा मस्जिद हरशेर मखदुमपुर में अकीदतमंदों का हुजूम उमड़ा। नौ रोजा मुकम्मल होने पर जुमे की नमाज के दौरान खुत्बे में मौलाना गुलाम मुर्तजा क़ादरी साहब ने इस्लाम के सिद्धांतों और रमजान की फजीलत पर रौशनी डाली।
बुराइयों से बचने का नाम है रोजा
मौलाना ने संबोधित करते हुए कहा कि रोजा सिर्फ सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह पूरे जिस्म का इबादत है। रोजे की हालत में इंसान को हर तरह की बुराइयों से बचना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि रमजान के दौरान सीखी गई परहेजगारी और नेक रास्ते पर चलने का संकल्प हमें पूरी जिंदगी के लिए लेना चाहिए।
जकात से मिटेगी गरीबी और सुरक्षित रहेगा माल
इस्लाम के चौथे रुकन ‘जकात’ पर चर्चा करते हुए मौलाना ने कहा कि यदि समाज के संपन्न लोग ईमानदारी के साथ अपनी जकात निकालें, तो मुआशरे (समाज) से गरीबी को काफी हद तक खत्म किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि जकात न केवल गरीबों की मदद है, बल्कि यह माल को पाक करने का जरिया भी है। जो शख्स नियमित रूप से जकात अदा करता है, उसका माल चोरी, डूबने या जलने जैसी आपदाओं से महफूज रहता है और अल्लाह की हिफाजत में रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जकात के सबसे पहले हकदार आपके अपने गरीब रिश्तेदार और पड़ोसी हैं।
फितरा की मात्रा और अदायगी के नियम
फितरा के बारे में जानकारी साझा करते हुए उन्होंने हदीस का हवाला दिया कि फितरा चार चीजों—गेहूं, जौ, खजूर और मुनक्का—के जरिए अदा किया जा सकता है। गेहूं की मात्रा 2 किलो 45 ग्राम तय है, जबकि अन्य चीजों की मात्रा इससे दोगुनी देनी होगी। उन्होंने मशवरा दिया कि सामर्थ्यवान (मालदार) लोगों को चाहिए कि वे अपने और अपने बच्चों का फितरा खजूर या मुनक्का की बाजार कीमत के हिसाब से अदा करें ताकि गरीबों का अधिक भला हो सके।
रमजान के तीनों अशरों की अहमियत
अंत में उन्होंने रमजान के तीन हिस्सों (अशरों) की फजीलत बताते हुए कहा कि पहला अशरा ‘रहमत’ का है जो गुजर रहा है। दूसरे अशरे में बंदों को अपने गुनाहों की सच्चे दिल से ‘तौबा’ करनी चाहिए और तीसरे अशरे में ‘जहन्नुम से निजात’ की दुआओं का खास एहतमाम करना चाहिए।
(रिपोर्ट: ज़ाहिद वारसी, गोरौल)








