रमजानुल मुबारक के तीसरे जुमे के खुतबे में मौलाना नसीम अहमद ने कहा अल्लाह हम लोगों पर रोजा फर्ज किया, पहला यौमें आशूरा का रोजा जो हर नबियों और उनके उम्मतियों पर फर्ज हुआ, बाद में इस्लाम में भी यौमे आशूरा के दो रोज मुसलमान पर फर्ज है, दूसरा माहे रमजान का पूरे माह का रोजा फर्ज है, रोज के हकीकत व फजीलत बहुत और इसकी फजीलत जितना बयान किया जाए कम है , इसका अजर मुकर्रर नहीं है -रोजा की हालत में आम वक्त से अलग नेकी के 10 – के बजाय 70 गुना ज्यादा शवाब अल्लाह अता करता है- रोज की हकीकत अल्लाह ही बेहतर जानता है – अल्लाह ने कुरान में फरमाया मैं आदम को अपनी सूरत में पैदा किया, सूरत के कुछ सिफत हासिल भी होनी चाहिए जो रोजा में मौजूद है -मुक्तसर ये के अल्लाह को भूख प्यास की कोई ख्वाहिश नहीं-इसलिए रोजा में इंसान भी दिन के उजाले में खाना पीना तर्क रखता है– अल्लाह ना तो बुराई करता है- इसलिए इंसान से भी तकादा है के आम दिन और खास करके रोजा के हालत में बुराई से दूर रहे, अल्लाह को किसी चीज की कोई हाजत नहीं है, इसलिए इंसान को भी रोजा की हालत में कोई हाजत नहीं यहां तक कि रोजे की हालत में अपनी बीवी से भी दूरी बनाए रखना है- अल्लाह हर हालत में सबकी भलाई करता है, इंसान से भी तकादा है की भलाई और नेकी करो – अल्लाह या दिखाना चाहता है कि कुछ सिफत इंसानों में मेरी झलक रही झलक आई — आदम को अल्लाह ने अपनी सूरत में पैदा किया इसलिए जाते आदम में भी अल्लाह की कुछ कुछ सिफत झलकती है , और झलकनी चाहिए , रोजा और आने वाली हर माह में तुम अपनी जिंदगी इसी तरह गुजारो।।नेकियां के साथ भलाईयों के साथ , सिर्फ भुखा प्यासा रहने का नाम रोजा नही है , हलाल रिज्क तलाशना है , जिस तरह खाना पानी से परहेज़ किया उसी तरह हर बुरे कामों से परहेज़ करना है, गरीब मजबूर बेसहारों की मदद करते रहना चाहिए, अपने जमा दौलत से जकात देना फर्ज है , माहे रमजान का यही पैगाम है । मौलाना नसीम अहमद








